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कैप्टन विक्रम बत्रा, नाम तो सुना ही होगा

कैप्टन विक्रम बत्रा, नाम तो सुना ही होगा

जुनून क्या होता है? ये पहली बार तब पता चला था जब एक कैप्टन की कहानी पढ़ी थी। नाम था 'विक्रम बत्रा'। कारगिल युद्ध का हीरो था ये कैप्टन। जिस उम्र में लोग अपना करियर तय नहीं कर पाते हैं उस उम्र में उस वीर कैप्टन ने अपनी शहादत की गौरवगाथा लिख दी थी।

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में 1974 में जन्मे इस कैप्टन की शिक्षा दीक्षा बिल्कुल वैसी ही जैसी किसी आम हिंदुस्तानी बच्चे की होती है। अलग तो वो अनुशासन था जो उन्हें बचपन से ही अपने आस पास के सैन्य छावनी में देखने को मिला था। अपने कॉलेज के दिनों में NCC के सर्वश्रेष्ठ कैडेट रहे थे विक्रम। 1997 में हांगकांग में मर्चेंट नेवी में नौकरी लग गयी लेकिन इस सपूत की चाहत तो फ़ौज की वर्दी थी। भारतीय सेना में शामिल होने के इसी जुनून की वजह से विक्रम बत्रा ने मर्चेंट नेवी की बड़े पैकेज की नौकरी ज्वाइन नहीं की। उसी साल उनका चयन भारतीय सेना में हो गया। IMA में 18 महीने की ट्रेनिंग के बाद विक्रम बत्रा को 13 Jammu Kashmir Rifles में Commission मिला।

विक्रम अब लेफ्टिनेंट विक्रम हो चुके थे। उन दिनों कारगिल का युद्ध भी छिड़ चुका था। 19 जून 1999 को उनकी यूनिट को कूच करने का आदेश दिया गया। उनकी यूनिट को तोलोलिंग दर्रे की सबसे ऊँची पहाड़ी 'Point 5140' को दुश्मनो से आज़ाद कराना था। तोलोलिंग की पहाड़ी पूरी चट्टानी थी। लगभग सीधी चढ़ाई थी। विक्रम बत्रा की टोली को ये ऑपरेशन रात में ही पूरा करने को कहा गया था क्योंकि सुबह होते ही ऊंचाई कब्ज़ा जमाये दुश्मन की गोलियां कभी भी किसी भी तरफ से आपको छलनी कर सकती थी। विक्रम बत्रा और उनकी टीम ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए उस बेहद कठिन Operation को पूरा किया वो भी बिना किसी Casualty के। ऊंचाई पर बैठे दुश्मन सैनिक जब तक कुछ समझ पाते तब तक विक्रम बत्रा दुश्मन की पूरी टोली का काम ख़त्म कर चुके थे। विक्रम के अभूतपूर्व कौशल को देखते हुए रणभूमि पर ही उनको प्रमोशन दे दिया गया। अब वो लेफ्टिनेंट से कैप्टन बन चुके थे। कैप्टन विक्रम बत्रा को उनकी यूनिट के लोग 'शेरशाह' कहकर बुलाने लगे थे।

अब उनकी यूनिट का मिशन मशकोह पर विजय प्राप्त करना था। इस Peak का नाम था '4875 Peak'। इस बार कैप्टन विक्रम को आराम करने के लिए कहा गया थे क्योंकि उनकी तबियत ठीक नहीं थी। विक्रम का शरीर बुखार से तप रहा था। शरीर में कई जगह जख्म थे लेकिन बावजूद इसके कैप्टन विक्रम बत्रा अपनी यूनिट के साथ जाने की जिद करने लगे। उनके Commanding Officer ने उन्हें मिशन में जाने की अनुमति दे दी। विक्रम का कारवाँ मिशन के लिए आगे बढ़ चुका था। उनकी यूनिट के हौसले बुलंद थे। कैप्टन विक्रम बत्रा तो मानो दुश्मन पर काल बनकर टूटने को उतावले हो रहे थे। उनकी यूनिट ने रास्ते के बीच में कैंप किया हुआ था। इसी बीच उनके साथी अफसर को दुश्मन ने निशाना बनाया। उनको बचाने के लिए विक्रम दुश्मन पर टूट पड़े। दोनों और से भीषण गोलीबारी हो रही थी। विक्रम की गोलियां पराक्रम के साथ दुश्मनो का खात्मा कर रही थी इसी बीच एक गोली कैप्टन विक्रम के सीने में आ लगी। शरीर छलनी हो चुका था। रक्त पुरे स्त्राव के साथ बह रहा था। लेकिन उनके अंदर तो मानो जुनून सवार हो चुका था। अपनी तनिक भी परवाह न करते हुए वो दुश्मन पर भारी पड़ रहे थे। वो शेर अब गिर जरूर चुका था लेकिन बन्दूक के ट्रिगर से उंगलिया नहीं डिगी थी। वो मनहूस दिन था 7 जुलाई 1999। कैप्टन विक्रम के आखिरी शब्द थे 'जय माता दी'। विक्रम शहीद हो चुके थे। कैप्टन विक्रम बत्रा के शहीद होने के ठीक 18 दिन बाद कारगिल युद्ध ख़त्म हो चुका था। ये वो वीर था जिसने कभी अपने दोस्तों के बीच कहा था "या तो मैं तिरंगा फहरा कर आऊंगा और या तो तिरंगे में लिपटकर आऊंगा, लेकिन आऊंगा जरूर।"

विक्रम अपना वादा पूरा कर चुके थे। दुश्मनो का काल अब चिरनिद्रा में था।

उसी साल 15 अगस्त 1999 को उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। एक सबसे दिलचस्प बात जो शायद पूरे देश को जाननी चाहिए वो ये थी जब विक्रम बत्रा Point 5140 जीत के बाद तिरंगा फहरा रहे थे तो उनके मुँह से 'ये दिल मांगे मोर' निकल रहा था।

आज भी कैप्टन विक्रम बत्रा के पराक्रम की शौर्यगाथा पूरी दुनिया जानती है। मेरी कलम मुझे रुकने की अनुमति नहीं दे रही है लेकिन आखिर में मैं बस इतना ही कहूंगा "हमें तुम पर नाज है कैप्टन, तुम बहुत याद आओगे कैप्टन, तुम बहुत याद आओगे कैप्टन"।


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